जब भीलो के महानायक बने वीर “विजय सिंह पथिक” !

जब भीलो के महानायक बने वीर “विजय सिंह पथिक” !

राजस्थान जनजागृति के जनक विजय सिंह पथिक

राजस्थान केसरी वीर विजय सिंह पथिक बिजोलिया आन्दोलन व -सत्याग्रह के महानायक हैं ,बेगू मेवाड मे सत्याग्रह के दिनो मे भील पथिक जी के साथ ऐसे घुलमिल गये थे कि वो प्यार से पथिक जी को पथिक दादा पुकारने लगे थे । उनकी समस्याओ के समाधान मे जुट गये ओर उन्होंने सामन्तशाही के अत्याचारों के खिलाफ सफल अभियान चलाया जिसने भीलो की काया पलट कर रखदी ।और सामन्तो को उनके आगे झुकना पडा ।गाँव गुठावली कलाँ, जिला बुलन्द शहर उ०प्र० मे चौधरी हमीर सिहँ राठी गुर्जर के घर जन्मे पथिक जी ऐसे क्रान्तिकारी थे  जिन्होंने राजस्थान की जनजागृति का अग्रदूत बनकर अपना सम्पूण जीवन देश के लिए न्यौछावर कर दिया। अंग्रेजो के पिट्ठू सामन्त जो किसानो से भारी व अनके कर वसूलते थे ,  किसानो को खेती के लिए भारी राज्य कर देना पडता था और भीलो को  उनकी शादी लायक लडकियो की जवानी का टैक्स के लिए सामन्तो को चमरिया कर देना पडता था ।जो भील चमरिया कर जब तक सामन्तो को नही दे तब तक उनकी बेटियो की शादी नही होने देते थे, चमरिया सामन्तों का का लगाया हुआ एक शादीकर जो हर भील को देना पडता था ।

विजय सिंह पथिक vijay singh pathik

एक दिन  भीलो ने इकटठे होकर अपनी ललनाओ के यौवन ओर जिन्दगी पर तरस खाकर चमरिया के विरोध मे आन्दोलन खडा कर दिया सामन्तो की गढी के दरवाजे पर हजारो भीलो की जमात एक आवाज बुलन्द कर रही थी  ‘हम चमरिया नही देगें ” सामन्त के कान मे हजारो भीलो का एक स्वर गूँज उठा उसकी गढी के सामने हजारो की संख्या मे भीलो की जमात खडी थी , बूढे भीलो की सफेद दाढियाँ या आज हजारो वर्षो के बाद सहसा कैसे हिलने लगी सामन्त हैरान था , काले भीलो की काली काली मूंछो ओर दाढियाँ गुस्से मे फडक रही थी। सामन्त जान गया कि इस गदर में जरुर किसी न किसी ओर ताकत का हाथ है ,वरना हजारो साल से गुलामो की तरह काम करने वाले भीलो मे इतनी ताकत ओर सूझबूझ कहाँ से आ गई जो आज इनकी आवाज आसमान तक को हिला रही है। सामन्त कसूबा पीकर अपने अंतरंग मे अनेक सुन्दरियो के यौवन से आँख मिचौली  खेल रहा था , इस बेवक्त के शोरगुल  से उसका दिल जल उठा और घोडे पर जीन कसकर तेजी से सवार हो कर गढी  के गिर्द पर चढ गया , गढी के दरवाजे की छत पर से उसने देखा गढी के दरवाजे के सामने भीलो की असंख्य भीड थी भीलो मे एक अजीब सा कोलाहल था उसने नीचे की ओर देखकर जोर से पुकारा तुम लोग यहा क्यों जमा हुए हो आखिर तुम लोग चाहते क्या हो  ?

हम चमरिया नही देंगे, चारो ओर से एक ही आवाज आने लगी । थोडी देर बाद भील अपनी बस्ती मे आ गये  आधी रात का समय हो हा था अचानक भीलो के  बीच खलबली मच गई  ,आवाज आई पथिक दादा आ गए एक रास्ता सा बन गया अब कुछ भील बोले अब  फैसला हो जायेगा , पथिक दादा आ गये ,

विजय सिंह पथिक vijay singh pathik

भारत सरकार द्वारा विजय सिंह पथिक जी के नाम पर जारी डाक टिकट

पथिक दादा ( विजय सिंह पथिक ) ने  भीलो को सम्बोधित करना शुरू किया ‘ बैठ जाओ मेरे भाइयो बैठ जाओ ”  हंगामा शान्त हुआ और आधे से ज्यादा लोग बैठ गये मशाले नीची हो गई ।  पथिक दादा जी बोले देखो रात के 11बजे हैं मेरे पीछे तुम लोग  जाने कब से इकटठे हो रहे हो यह जानकर मुझे बडा ही दुख  हो रहा है। लेकिन एक बात यह है कि सिवाय इसके कि तुम गांव खाली कर दो इस बीमारी का कोई ओर इलाज नही है।

 

भील बोले लेकिन पथिक दादा हम हजारो लोग बेघरबार हो जायेंगे न जाने हमें कहाँ कैसी जमीन मिले हमारे बच्चे हमारे मवेशियो ये सब कहाँ जायेंगे ? दादा पथिक बोले  भाईयो ये काम मेरा है । मैं जैसा कहूँ  आप सब वैसा ही करो फिर देखो क्या होता है । यहाँ से सात मील उत्तर की और करीब चार मील के वर्ग का एक जंगल बेकार पडा है। जिसको महाराणा ने बेकार समझ कर छोड रखा है। अगर तुम्हारे बाजुओ मे ताकत है तो तुम फौरन ही वहाँ जाकर अपनी जिन्दगी आजाद ओर मस्त रह कर बसर कर सकते हो,  हजारौ हाथ मिलकर जंगल मे मंगल कर सकते हो , बोलो इस गुलामी के चगुंल से आजाद होना चाहते हो या नही ?

पथिक दादा की आवाज मे दम था जोश था पहले आपस मे कुछ फूसफुसावट  सी हुई भीलो मे  इतने नुकसान ओर मेहनत से तो चमरिया देना ही अच्छा है। लेकिन इस तरह से ये बीमारी मिट भी सकती है । हर्गिज नही ।आखिर सबने मिलकर एक ही निश्चय किया कि गांव को एक बार तो खाली ही कर देंगे । पथिक दादा बोले लेकिन भाइयो ये इतना छोटा ओर गुडियो का खेल नही है।  भीलो को समझाया गांव छोडने का मतलब सामन्त की गढी की बरबादी अगर हम अपनी आन पर कायम रहे। तो याद रखना इस गढी की दीवारे भी हिल उठेंगी ओर सल्तनत का ताज तुम्हारे कदमो मे होगा , बोलो तैयार हो ? क्या अपनी बहन ओर बेटियो की इज्जत आबरू  का टैक्स हटाने के लिए कुछ भी कुरबानी दे सकने के लिए? तब भीलो ने बुलंद स्वर में हुँकार भरी   हाँ पथिक दादा हम आपका कहा मानने को तैयार हैं । हम गांव को फौरन ही खाली कर देगें । हंगामा मच गया , बिलकुल तैयार हैं बिलकुल तैयार हैं।

विजय सिंह पथिक vijay singh pathik

पथिक दादा बोले तो फिर सुबह होते ही गांव को खाली करना शुरू कर दो कि सारा असबाब बांधकर तैयार हो जाये ओर सूरज निकलने से पहले ही यहा से उसी जंगल को रवाना हो जायेगें । मैं  भी सुबह तक तुम लोगो के साथ रहूँगा । सुबह होते ही तुम लोगो को राहा से विदा कर मै भी गुजरात की सीमा में  जा पहुचुगा । भील बोले दादा हमारे साथ रहना दादा । तुम नही जानते महाराणा ने मुझे देश निकाला दे दिया है मै भी इस आजादी के लिए बागी बना हूँ, वतन की आजादी के लिए लडना ही हमारी जिन्दगी है ।पथिक दादा की आंखों मे खून चमकने लगा ।भीलो के सीने फूल गये ओर वे चीख उठे  पथिक दादा जिन्दाबाद , पथिक दादा जिन्दाबाद।

इधर सामन्त को उसके पिछलगगूओ ने सारा माजरा कह सुनाये , अय्याश व अंग्रेजपरस्त  सामंत को रात भर नींद नहीं आयी ,बिस्तर में शिकने पड गई । उसका दिल खौफनाक तब्दीली से , इतने बडे जनपलायन से  कांप उठा । एक लाख की आमदनी उसकी जिन्दगी भर की गाढ़ी कमाई की तबाही,  ब्रिटिस सरकार को दिया जाने वाला भारी टैक्स ये सारी की  सारी समस्याए उसके दिमाग मे घूमने लगी उसकी समझ में नहीं आ रहा था की आखिर क्या करे ? । वह सुबह जल्दी  अपने महल से निकला घोडे पर सवार  होके भीलो की बस्ती की ओर  अँधेरा घिरे धीरे धीरे उजाले मे तब्दील हो रहा था,  आखिर भीलो की बस्ती मे आ ही पहुंचा ।  वह कांप उठा ओर पागलो कि तरह चिलाने लगा ठहरो अभी गांव खाली मत करो। तुम लोग यहीं पर रहोगे |

सबने एक साथ सामन्त को जवाब दिया कि अब तो यहाँ से जाकर ही रहेंगे  । सामंत गुर्राया , देखूंगा तुम लोग यहाँ से कैसे जाते हो? भील बोले  हमें दुनिया की कोई ताकत नही रोक सकती पर हाँ एक शर्त है, हम रुक सकते है। सामंत घबराया सा बोला  मुझे तुम्हारी सब शर्ते मंजूर है लेकिन गांव खाली नही होगा ।बोलो तुम्हारी क्या शर्त है ? बस यही कि तुम लोग चमरिया नही दोगे बोलो यही है न । भील बोले हम अपनी बहन बेटियो कि जवानी की बेडियों को काटना चाहते है ।हम इस अन्याय व जुल्म ज्यादाती को बरदाश्त नही कर सकते । भीलो के नेता ने कहा और पथिक की ओर देखकर मुहँ ताकने लगा पथिक दादा  (विजय सिंह पथिक) अपनी सफलता पर मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे। वे खुश थे कि उनके इस कदम ने ना केवल भीलो को हक दिलाये बल्कि उनमें स्वाभिमान व बोलने का साहस भी भर दिया, आवाज उठाने लगे। आज उन्होंने एक मंजिल पार कर ली सामन्त का गरुर और शान जनता की ताकत के सामने झुक गई ।

जय पथिक जी।
राजस्थान केसरी वीर विजय सिंह पथिक अमर रहे।

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